kya nam dun| क्या नाम दूँ : तनुज पंत ‘अनंत ‘ की भावपूर्ण कविता
तुम जो गुज़री हो
सरसराती पवन सी
हृदय स्पंदित करती
प्रकाश पुंज सी रेखा खींचती,
मन चाहता है
तुम्हें सम्मान दूँ , परन्तु
किस नाम से पुकारूँ तुम्हें
क्या नाम दूँ ?
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तुम जो गुज़री हो
सरसराती पवन सी
हृदय स्पंदित करती
प्रकाश पुंज सी रेखा खींचती,
मन चाहता है
तुम्हें सम्मान दूँ , परन्तु
किस नाम से पुकारूँ तुम्हें
क्या नाम दूँ ?
जीवन कितनों का है संवारा,
तुमने अपना विद्या-बल देकर ।
वीर शिवा, राणा और चन्द्रगुप्त,
बने महान तव संबल पाकर
तुम्हीं कहती थीं
सागर सा गहरा
आकाश सा विस्तृत
भूमि सा पवित्र
है हमारा रिश्ता,
फिर क्यों करे
हम कल की चिन्ता
हर घर में तिरंगा लहराए,हर दिल में तिरंगा बस जाए।अपना भारत प्राणों से प्यारा,हर लब यह गीत गुनगुनाए। तीन रंगों की छटा निरालीधरती से गगन तक छा जाए।तिरंगे की विराटता में,सारा जग समा जाए।उस दिव्य भाव को छू लें,जो देश प्रेम की राह दिखाए।हर घर में तिरंगा लहराए,हर दिल में तिरंगा बस जाए। रंग केसरिया … Read more
राष्ट्रध्वज तिरंगा हमारी आन, बान और शान का प्रतीक है। इस पोस्ट में हम प्रस्तुत कर रहे हैं, सभी देशवासियों के लिए वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. नंद किशोर ढौंडियाल ‘अरूण’ की राष्ट्रध्वज तिरंगे पर लिखित दो विशेष कविताएं….
बचपन जीवन का वह दौर होता है जो मन के किसी कोने में हमेशा छुपा होता है। जीवन को आनदं और सहजता से भर देता है। जीवन में ऊर्जित होकर कोई कार्य सम्पन्न करना हो तो स्वयं के भीतर ईश्वरीय वरदान अर्थात बचपन जिंदा रखे।
” निश्छल बचपन है सम ईश्वर ”
न कोई उलझन यहाँ ,
दिमाग़ों के तार में।
हर मुश्किल के हल यहाँ,
सरल-सहज व्यवहार में।
शरारतें यहाँ कोई साजिश नहीं हैं।
यह तो मासूमियत की चरम स्थिति है।
बुद्धि के खेल में कहाँ तृप्ति है?
नादानियों में भी छुपी जिंदगी है।
झांक कर देखो स्वयं के भीतर,
जिंदा है अभी भी बचपन का मंजर।