देहरादून, 12 फरवरी। उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा के पाठ्यक्रम में लागू की गई ‘हमारी विरासत एवं विभूतियाँ’ नामक पुस्तकें आजकल नए कलेवर में तैयार की जा रही हैं । विगत वर्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की अनुशंसाओं के अनुरूप भारतीय ज्ञान परम्परा और स्थानीय संदर्भों को महत्व देने की दृष्टि से एस. सी. ई. आर. टी. उत्तराखंड द्वारा हमारी विरासत एवं विभूतियाँ पुस्तक तैयार की गई हैं। यह पुस्तकें कक्षा 6 से 8 के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं जो विद्यालयों में सामाजिक विज्ञान के अंतर्गत पढ़ाई जा रही है।

इन पुस्तकों के माध्यम से बच्चों ने क्या सीखा? इसको जानने के लिए अभ्यास प्रश्न तैयार किए जा रहे हैं। इसके लिए एस. सी. ई. आर. टी. उत्तराखंड द्वारा चार दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। अभ्यास प्रश्नों को तैयार करने में गिरीश सुन्द्रियाल, डॉ. उमेश चमोला, गीता भट्ट, हेमंत चौकियाल, वृजेश कुमार मिश्रा, डॉ वीर सिंह रावत, मोनिका चौहान, लक्ष्मी प्रसाद मालगुड़ी, बचन लाल जितेला, नरेन्द्र सिंह बिष्ट, सीमा शर्मा, दीपिका पँवार, वीरेंद्र सिंह कठेत, राम सिंह, दिनेश रावत, सुरेंद्र आर्यन,अंबरीश बिष्ट, मौहम्मद नईम, विमल किशोर, देवेश जोशी, धर्मेंद्र सिंह नेगी कृष्ण कुमार बिजलवाण, राजेश खत्री, मुन्नी रावत, दीक्षिता, ममता उप्रेती और वंदना डिमरी कंसवाल ने अपना योगदान दिया। कार्यशाला के समापन के अवसर पर निदेशक अकादमिक शोध एवं प्रशिक्षण बंदना गर्बयाल ने कहा कि हमारी विरासत एवं विभूतियाँ पाठ्य पुस्तक का उद्देश्य बच्चों को अपनी गौरवशाली विरासत से परिचित कराना है। तैयार अभ्यास प्रश्नों से बच्चों के आकलन में सहायता मिलेगी। अपर निदेशक एस. सी. ई. आर. टी पदमेंद्र सकलानी ने कहा कि यह पाठ्य पुस्तक बच्चों की प्रतियोगिता संबंधी तैयारी के लिए भी महत्वपूर्ण सिद्ध होगी। डॉ. कृष्णानन्द बिजलवाण सहायक निदेशक एस. सी. ई. आर. टी ने कहा कि इस पुस्तक के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति जानने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि विद्यालय में विभिन्न अवसरों पर चलाए जा रहे कार्यक्रमों में इस पुस्तक में दी गई सामग्री का उपयोग किया जा सकता है।

कार्यक्रम समन्वयक सुनील भट्ट ने पावर पॉइंट के माध्यम से प्रश्नों के ब्लू प्रिंट पर अपनी बात रखी. उन्होंने स्मृति आधारित, बोधात्मक, कौशलात्मक, अनुप्रयोगात्मक आदि प्रकार के प्रश्नों को उदाहरण के साथ समझाया। डॉ. गोपाल घुघत्याल ने कहा कि हमारी विरासत, हमारी विभूतियाँ पुस्तक को विद्यार्थियों के अलावा अभिभावक और उत्तराखंड की संस्कृति में रुचि रखने वाले पाठक भी पसंद कर रहे हैं।